समझाने का तरीका:
यह देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ . राजेंद्र प्रसाद कीयुवावस्था की घटना है। उन दिनों उनके घर कई रिश्तेदारआए हुए थे। उनके कई बच्चे थे। सारे बच्चे घर में खूबधमाचौकड़ी मचाते थे। एक दिन उन लोगों ने राजेंद्र बाबूकी एक किताब के कुछ पन्ने फाड़ दिए। राजेंद्र बाबूपरेशान हो गए। वह जानते थे कि यह उन्हीं में से किसीबच्चे की करतूत है लेकिन यह पता कैसे चले कि किसने पन्नेफाड़े हैं।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी राजेंद्र प्रसाद को एक युक्ति सूझी।उन्होंने उन बच्चों को बुलाकर कहा , ' जिस बच्चे ने इसपुस्तक के जितने ज्यादा पन्ने फाड़े हैं , उसको उतने ज्यादापैसे मिलेंगे। ' यह युक्ति काम कर गई। बच्चों ने खुशी -खुशी बता दिया कि किसने कितने पन्ने फाड़े हैं। राजेंद्रबाबू खुश हो गए कि बिना सख्ती बरते ही सचाई सामनेआ गई। पैसे देने के बाद राजेंद्र बाबू ने उन बच्चों को समझाया , ' देखो बच्चों तुम्हें पैसे मिल गए। लेकिन तुम्हारायह काम बिल्कुल ठीक नहीं। किसी किताब के पन्ने फाड़ना बहुत गलत बात है। किताबों से हम ज्ञान प्राप्त करते हैं।उनसे बहुत कुछ सीखते हैं। उन्हें नुकसान पहुंचाकर हम अपना ही नुकसान करते हैं। आगे से ऐसा कभी मतकरना। '
राजेंद्र बाबू की बातों का बच्चों पर गहरा असर पड़ा। सभी बच्चों ने उन्हें वचन दिया कि वे आगे से कभी ऐसा नहींकरेंगे। राजेंद्र बाबू ने बाद में भी लोगों को समझाने , उन्हें सही रास्ते पर लाने के लिए ऐसी ही युक्तियों का सहारालिया और वह अपने मकसद में कामयाब भी रहे।
मन की शांति:
गुरु और शिष्य तीर्थ-यात्रा करके लौटे तो उन्होंने देखा कि उनकी कुटिया उजड़ी हुई थी। वर्षा और आंधी-तूफान ने उसके आधे भाग को ही उड़ा दिया था। कुटिया में रखा सारा सामान भी अस्त-व्यस्त पड़ा था। यह देखकर शिष्य क्रोधित होकर बोला , ' गुरुदेव , यही सब देखकर तो भगवान से मेरा विश्वास उठ जाता है। जो दुर्जन हैं , उनके महल भी सुरक्षित हैं और हम दिन-रात साधना में लगे रहते हैं फिर भी ईश्वर हमारी झोपड़ी तक का ख्याल नहीं रखते। '
गुरु मुस्कराकर बोले , ' वत्स , मैं तो परमात्मा को धन्यवाद देता हूं कि उसने हमारी रक्षा की है। उसकी करुणा का मैं ऋणी हूं। आंधी-तूफान का क्या भरोसा! वह तो पूरी कुटिया को उड़ाकर ले जा सकता था। पर परमात्मा की कृपा से कुटिया इस हालत में है कि इसे फिर से बनाया जा सकता है। '
इस पर शिष्य ने कहा , ' पर गुरुदेव , अधार्मिकों के महलों का ईश्वर कुछ नहीं करता। वे अब भी शान से खड़े हैं। '
गुरु ने समझाया , ' अगर इस तरह दुनिया को देखोगे तो कभी चैन से नहीं रह पाओगे। अधार्मिकों के महल जरूर शान से खड़े हैं लेकिन उनके मन की क्या हालत है , यह तुम नहीं देखते ? मनुष्य महल या कुटिया में प्रसन्न नहीं होता न ही उसे पूर्ण शांति मिलती है। असली चीज है मन की शांति। हमारे पास मन की शांति है क्योंकि हम ईश्वरोपासना और जन कल्याण में लगे हैं। जो दुनियावी प्रपंचों में लीन हैं , उनका जीवन भारी तनाव और दुख में बीतता है। '
गुरु की बात सुनकर शिष्य टूटी कुटिया को ठीक करने में जुट गया।
"मैं--तू' ध्यान:
कभी एक छोटा प्रयोग करें...चौबीस घंटे के लिए 'मैं' को केंद्र से हटा दें, सिर्फ चौबीस घंटे के लिए; 'तू' को केंद्र पर रख लें। सिर्फ चौबीस घंटे के लिए सतत स्मरण रखें कि 'तू'। जब पैर में पत्थर लग जाए, तब भी; जब कोई गाली दे जाए, तब भी; जब कोई अंगारा फेंक दे ऊपर, तब भी; जब कोई फूल की माला डाले, तब भी; जब कोई चरणों में सिर रख दे, तब भी--चौबीस घंटे के लिए स्मरण रख लें कि मैं नहीं हूं केंद्र पर, 'तू' है। तो आपकी जिंदगी में एक नये अध्याय का प्रारंभ हो जाएगा। अगर चौबीस घंटे यह स्मरण संभव हो सका, अगर पूरा न भी हुआ, चौबीस घंटे में चौबीस मिनट भी पूरा हो गया, तो आप वही आदमी दुबारा नहीं हो सकेंगे; क्योंकि एक बार 'तू' के साथ जीने की निश्चिंतता मिल जाए तो फिर आप 'मैं' के साथ कभी जीना न चाहेंगे।
'मैं' से भार 'तू' पर चला जाए तो शुद्ध चेतना को खोजना आसान हो जाता है; या शुद्ध चेतना मिल जाए तो 'मैं' से तत्काल 'तू' की तरफ भाव चला जाता है। इसलिए उसे "त्वम्' कहा है।
ओशो: ध्यान विज्ञान
मौन का रंग:
जब भी आपको नीले रंग का कोई दृश्य दिखे--आकाश का नीलापन या नदी का नीलापन--तो बस शांत बैठ जाएं और उसकी नीलिमा में देखते रहें। और आपको एक गहन शांति अनुभव होगी। जब भी आप नीले रंग पर ध्यान करेंगे, एक गहन शांति आप पर उतर आएगी।
नीला रंग सबसे अधिक आध्यात्मिक रंगों में से एक है, क्योंकि वह शांति का, मौन का रंग है। वह थिरता का, विश्राम का, लीनता का रंग है। तो जब भी आप गहन शांति में होते हैं, अचानक आप भीतर एक नीली ज्योति महसूस करेंगे। और यदि आप अपने भीतर नीली ज्योति का भाव करें तो आप एकदम शांत महसूस करेंगे। यह दोनों तरफ से काम करता है।
उपहार:
शरीर को भलीभांति काम करना चाहिए, अच्छी तरह से। यह एक कला है, यह तप नहीं है। तुम्हें उसके साथ लड़ना नहीं है, तुम्हें उसे केवल समझना है। शरीर इतना बुद्धिमान है ... तुम्हारे मस्तिष्क से बुद्धिमान, ध्यान रहे, क्योंकि शरीर मस्तिष्क से ज्यादा समय जीया है। मस्तिष्क बिल्कुल नया आया है, महज एक बच्चा है।
शरीर बहुत प्राचीन है, बहुत ही प्राचीन ... क्योंकि कभी तम एक पत्थर की तरह जीते थे––शरीर तो था लेकिन मन सोया हुआ था। फिर तुम एक पेड़ हुए; शरीर था उसकी पूरी हरियाली और फूलों के साथ। लेकिन मन अभी भी गहरी नींद सोया था; पत्थर की तरह न सही लेकिन फिर भी सोया तो था। फिर तुम बाघ हुए, पशु हुए,; शरीर ऊर्जा से इतना ओतप्रोत था लेकिन मन काम नहीं कर रहा था। तुम पक्षी हुए, मनुष्य हुए ... शरीर लाखों साल से कार्यरत है। शरीर ने अत्यधिक प्रज्ञा इकट्ठी कर ली है। शरीर बहुत प्रज्ञावान है। इसलिए यदि तुम बहुत ज्यादा खाते हो तो शरीर कहता है, " रुक जाओ!" मन इतना बुद्धिमान नहीं है। मन कहता है, "स्वाद अच्छा है, थोड़ा अधिक लो।" अगर तुम मन की सुनते हो तो तो मन शरीर का नुकसान करता है किसी न किसी प्रकार से। यदि तुम मन की सुनोगे, तब मन पहले तो कहेगा, " खाये जाओ।" क्योंकि मन मूर्ख है, बच्चा है। वह नहीं जानता वह क्या कह रहा है। वह नया-नया आया है। उसके भीतर कोई शिक्षा नहीं है। वह बुद्धिमान नहीं है, वह अभी भी मूर्ख है। शरीर की सुनो। जब शरीर कहता है, भूख लगी है तब खाओ। जब शरीर कहता है, रुक जाओ, तब रुको।
जब तुम मन की सुनते हो तो यह ऐसा है जैसे एक छोटा बच्चा एक बूढ़े आदमी को राह दिखा रहा है, वे दोनों गड्ढे में गिरेंगे। अगर तुम मन की सुनोगे तो पहले तुम इंद्रियों में गिर जाओगे और फिर तुम उससे ऊब जाओगे। हर इंद्रिय तुम्हारे लिए दुख ले आएगी और हर इंद्रिय अधिक चिंता, क्लेश और पीड़ा ले आएगी। अगर तुमने बहुत ज्यादा खा लिया तो पीड़ा होगी और फिर उलटी हो जाएगी। पूरा शरीर अस्तव्यस्त हो जाता है। तब मन कहता है, "भोजन बुरा है, इसलिए उपवास करो।" और उपवास सदा खतरनाक होता है। अगर तुम शरीर की सुनो तो वह कभी ज्यादा नहीं खाएगा और न कभी कम खाएगा; वह सिर्फ ताओ का अनुसरण करेगा।
कुछ वैज्ञानिक इस समस्या पर काम कर रहे हैं और उन्होंने बहुत सुंदर तथ्य की खोज की है: छोटे बच्चे तभी खाते हैं जब वे भूखे होते हैं, वे तभी सोते हैं जब उन्हें नींद आती है। वे अपने शरीर की सुनते हैं। लेकिन उनके माता-पिता उनमें बाधा डालते हैं। वे जबरदस्ती करते हैं कि यह भोजन का समय है, या लंच का समय है, या सोने का समय है.... अब जाओ! वे उनके शरीर को मुक्त नहीं छोड़ते।
एक अन्वेषक ने बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया। वह पच्चीस बच्चों पर काम कर रहा था। उन पर सोने की जबरदस्ती, या उठने की जबरदस्ती नहीं की गई। छह महीने तक उन पर कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की गई। और एक गहन समझ विकसित हुई।
वे गहरी नींद सोए , उन्हें कम सपने आए, कोई डरावने सपने नहीं आए , क्योंकि डरावने सपने मां-बाप के कारण आ रहे थे जो उन पर जबरदस्ती करते थे। उन्होंने खाना ठीक से खाया, न जरूरत से ज्यादा न कम । उहोंने खाने का मज़ा लिया और कभी-कभी वे खाना बिलकुल नहीं खाते। जब शरीर राजी नहीं होता तो वे खाना नहीं खाते। और भोजन के कारण होनेवाली बीमारी से वे बीमार नहीं हुए।
इससे एक बात समझ में आई जिसका किसी को शक भी नहीं हुआ था और वह चमत्कार था। सिर्फ सोसान इसे समझ सकता है, या लाओत्ज़ु या च्वांग्त्ज़ु। क्योंकि ये लोग ताओ के अधिकारी हैं। यह ऐसी अद्भुत खोज थी। उन्हें यह समझ आई कि जब बच्चा बीमार हो तो वह एक खास तरह का खाना नहीं खाता। फिर उन्होंने समझने की कोशिश की कि वह ये चीजें क्यों नहीं खा रहा है। उनका जब विश्लेषण किया गया तब पाया गया कि उस बीमारी के लिए वह भोजन हानि कारक है। अब बच्चे ने कैसे तय किया? सिर्फ शरीर के कारण ....
जब बच्चा बड़ा हो रहा था तब उसके विकास के लिए जो भी जरूरी था उसे वह ज्यादा खाता था। फिर उन्होंने भोजन का विश्लेषण किया और पाया कि ये चीजें सहयोगी थीं। भोजन बदल जाता क्योंकि जरूरतें बदल जातीं। एक दिन बच्चा कुछ खाता और दूसरे दिन वही बच्चा उसे नहीं खाता था। और वैज्ञानिकों को अहसास हुआ कि शरीर की प्रज्ञा होती है।
अगर तुम शरीर को उसके हिसाब से चलने दो तो तुम सही रास्ते पर हो, राज मार्ग पर। और यह सिर्फ भोजन के बारे में सच नहीं है, यह पूरे जीवन के बारे में सच है। तुम्हारा सेक्स विकृत होता है तुम्हारे मन के कारण, तुम्हारा पेट गड़बड़ होता है तुम्हारे मन के कारण। तुम शरीर में हस्तक्षेप करते हो। हस्तक्षेप मत करो! अगर तीन महीने तक भी इसका पालन कर सको कि हस्तक्षेप मत करो तो अकस्मात तुम स्वस्थ हो जाओगे, और तुम्हारे ऊपर एक आंतरिक स्वास्थ्य उतरेगा। सब कुछ ठीक नजर आएगा। जैसे जूता पैर में फिट हो गया। लेकिन मन समस्या है।
अगार तुम इंद्रियों की सुनोगे तो तुम सरल हो जाओगे। निश्चय ही कोई तुम्हें आदर नहीं देगा क्योंकि वे कहेंगे, "यह भोगी आदमी है।" एक भोगी आदमी गैरभोगी आदमी से अधिक जीवंत होता है। शरीर की सुनो। क्योंकि यहां तुम इस क्षण का आनंद लेने के लिए हो जो तुम्हें मिला है, यह प्रसादपूर्ण क्षण, यह धन्यता जो तुम्हारे साथ घटी है। तुम जीवंत हो, जागरूक हो, और इतने विराट विश्व में।
इस छोटे से ग्रह पर, बहुत छोटे, नन्हे से ग्रह पर मनुष्य एक चमत्कार है। सूरज साठ गुना ज्यादा बड़ा है इस पृथ्वी से। और यह सूरज सामान्य है, ऐसे लाखों सूरज हैं और लाखों विश्व और ब्रह्माण्ड हैं। अब तक ऐसा लगता है, जहां तक विज्ञान की पहुंच है, कि जीवन और चेतना सिर्फ इस धरती पर घटी है। यह धरती धन्य है।
तुम्हें पता नहीं है तुमने क्या पाया है। यदि तुम्हें इसका अहसास हो कि तुमने क्या पाया है, तुम बहुत कृतज्ञ होओगे और इससे अधिक कुछ नहीं मांगोगे। तुम एक चट्टान भी हो सकते थे और तुम इसके बाबत कुछ नहीं कर सकते थे। तुम एक मनुष्य हो। और तुम दुख झेल रहे हो, और तुम चिंतित हो और तुम पूरी बात ही चूक रहे हो। इस क्षण का आनंद लो क्योंकि यह क्षण दुबारा नहीं आएगा।
हिंदुओं का यही अभिप्राय है: वे कहते हैं, तुम फिर से चट्टान बन जाओगे। अगर तुम आनंद नहीं लोगे और विकसित नहीं होओगे तो तुम नीचे गिर जाओगे। तुम एक जानवर बन जाओगे। यह अर्थ है: हमेशा याद रखना कि चेतना की यह चरम दशा एक ऐसा शिखर है: अगर तुम इसका आनंद नहीं लेते या इससे केंद्रित नहीं होते तो तुम नीचे गिर जाओगे।
गुर्जिएफ कहता था कि अभी तुम्हारे पास आत्मा नहीं है; जीवन केवल एक अवसर है उसे पाने का, आत्मवान होने का। और कौन जाने यह अवसर फिर कब मिलेगा या नहीं मिलेगा? कोई नहीं जान सकता, कोई है ही नहीं जो इसके बारे में कुछ कह सकता है।
इतना ही कहा जा सकता है कि इस क्षण यह मौका तुम्हें मिला है। यदि तुम इसका आनंद लेते हो, यदि तुम उसमें मस्त हो जाते हो, कृतज्ञता अनुभव करते हो तो वह और सघन हो जाएगा। तुमहरे पास जो भी है वह बहुत ज्यादा है। अनुगृहीत होने के लिए आभारी होने के लिए यह काफी है। अस्तित्व से और मत मांगो। तुम्हें जो मिला है उसका मज़ा लो। और तुम जितना मज़ा लोगे उतना तुम्हें और दिया जाएगा।
जीसस एक बहुत विरोधाभासी बात कहते हैं, " यदि तुम्हारे पास अधिक है तो तुम्हें और अधिक दिया जाएगा, और तुम्हारे पास अगर कुछ नहीं है तो जो तुम्हारे पास है वह भी छीन लिया जाएगा। " यह तो बेतुका मालूम होता है। किस तरह का गणित है यह? " यदि तुम्हारे पास अधिक है तो तुम्हें और अधिक दिया जाएगा, और तुम्हारे पास अगर कुछ नहीं है तो जो तुम्हारे पास है वह भी छीन लिया जाएगा।" लगता है यह धनवान आदमी के लिए है और गरीब आदमी के विपरीत है।
इसका सामान्य अर्थशास्त्र से कोई संबंध नहीं है, यह तो जीवन का परम अर्थशास्त्र है। जिनके पास है उन्हें अधिक दिया जाएगा क्योंकि जितना वे मज़ा लेंगे उतना वह बढ़ेगा। जीवन विकसित होता है आनंद के कारण। प्रसन्नता सूत्र है। प्रसन्न होओ, अंनुगृहीत होओ जो भी है उसके प्रति। जो भी! उसमें मस्त हो जाओ, फिर और खुलता है, तुम्हारे ऊपर और गिरता है। तुम इस योग्य हो जाते हो कि तुम्हारे ऊपर और आशीष उतरे। जो अनुगृहीत नहीं है वह उसे भी खो देगा जो उसके पास है। जो अनुगृहीत है उसे समूचा अस्तित्व मदद करेगा कि वह अधिक विकसित हो क्योंकि वह योग्य है और उसे उसकी कदर है जो उसे मिला है।
(ओशो, द बुक ऑफ नथिंग:सिन सिन मिंग प्रवचन #6)
गुरु और शिष्य:
एक बार शिवाजी और समर्थ गुरु रामदास बरसात के मौसम में एक उफनती नदी के किनारे नदी पार करने के लिए खडे़ थे। दोनों में बहस हो रही थी कि मैं नदी को पहले पार करूंगा। इसी दौरान दैवयोग से एक नाविक भी वहां पहुंच गया। उसने उन्हें नदी के पार पहुंचा दिया। पार पहुंचने पर शिवाजी ने रामदास से पूछा, 'गुरुदेव, आप पहले नदी पार करने के लिए क्यों आतुर हो रहे थे?' रामदास ने बड़ी गंभीरता से शिवाजी से कहा, 'तुम्हीं बताओ कि तुम मुझसे पहले नदी में उतरने को क्यों तैयार थे?'
शिवाजी बिना कुछ कहे गंभीर मुद्रा में गुरु के समक्ष खडे़ रहे। फिर गुरु महाराज ने कहा, 'शिवाजी, तुम हिंदू धर्म-संस्कृति के रक्षक, प्रजापालक राजा हो। यदि नदी पार करते समय तुम तेज बहाव में कहीं बह जाते तो इस राज्य और धर्म का क्या होता? यदि मैं पहले नदी पार करते समय डूब भी जाता तो कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था क्योंकि मै अकेला प्राणी हूं।' यह सुनकर शिवाजी उनके चरणों पर गिर पड़े और बोले, 'गुरुदेव आपके बिना कैसा धर्म, कैसी संस्कृति और कैसा राष्ट्र? मेरे मर जाने से आप जैसे सद्गुरु एक नहीं हजारों शिवाओं को तैयार कर सकते हैं। मैं तो आपके चरणों का दास हूं और कुछ नहीं।' शिवाजी के ये वाक्य सुनकर समर्थ गुरू रामदास गदगद हो गए। उन्होंने शिवाजी को गले लगा लिया और कहा, 'तुम धर्म और मर्यादा को अच्छी तरह जानते हो। जहां तुम जैसे समर्पित राष्ट्रभक्त होंगे वह राष्ट्र हमेशा पूरे विश्व का मार्गदर्शन करता रहेगा।'
मजबूत नींव :
राजा समर सिंह को अपनी प्रजा से अधिक प्रिय धन-सम्पत्ति एकत्र करना था। उन्होंने अपनी अधिकतर संपत्ति को महल की सुंदरता बढ़वाने में लगवाया था। जो भी आता वह उनके महल की प्रशंसा किए बिना नहीं रहता था। राजा समर सिंह का मंत्री चतुर सिंह बेहद समझदार था। वह राजा की इस आदत से परेशान था। एक दिन उसने सुना कि उनके नगर में एक युवा संन्यासी आया हुआ है और वह हर किसी की मुसीबत का समाधान कर देता है। वह भी युवा संन्यासी से मिलने पहुंचा और बोला, 'महाराज, हमारे राजा अपने नगर को मजबूत बनाने के बजाय महल के रखरखाव पर अधिक धन खर्च करते हैं। उन्हें प्रजा की सुरक्षा से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे में शत्रु भी अवसर देखकर आक्रमण करने को तैयार रहते हैं। कृपया राजा का इस प्रकार से मार्गदर्शन करें कि उन्हें सही-गलत की पहचान हो जाए और वह अपनी प्रजा की समुचित देखभाल करते हुए देश की संपत्ति को महल के रखरखाव पर खर्च करने के बजाय जरूरी कार्यों पर खर्च करें।'
संन्यासी ने मंत्री को आश्वासन दिया और कहा कि वह स्वयं महल में आएगा और राजा से बात करेगा। मंत्री वहां से चला आया। अगले दिन नियत समय पर वह संन्यासी महल में पधारा। उसका खूब स्वागत-सत्कार किया गया। राजा ने संन्यासी को पूरा मान-सम्मान दिया। किंतु उसे बार-बार एक बात खलती रही कि संन्यासी ने एक बार भी उसके महल की तारीफ नहीं की। अभी तक उसे अपने जीवन में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला था जिसने उसके महल की दिल खोलकर तारीफ न की हो।
आखिर राजा से न रहा गया और वह बोल ही पड़ा, 'महाराज, क्या मेरे महल में कोई कमी है जो आपने इसकी प्रशंसा में एक भी शब्द नहीं बोला।' संन्यासी यह सुनकर बोला, 'राजन्, तुम्हारा महल सच में बहुत सुंदर व मजबूत है। यह बहुत लंबे समय तक नष्ट नहीं होगा, लेकिन यह बताइए कि क्या इसमें रहने वाला भी लंबे समय तक जीवित रहेगा। इसलिए महल की नींव मजबूत बनाने से पहले व्यक्ति को अपनी नींव मजबूत बनानी चाहिए। क्योंकि नींव मजबूत होने पर उसके जाने के बाद भी सदियों तक उसे याद किया जाता रहेगा।' यह सुनकर राजा की आंखें खुल गईं और उसे अपनी गलती का अहसास हो गया।
लाओत्से के पास एक युवा सैनिक, जिसने धर्मशास्त्रों का भी अध्ययन किया था, पहुंचा। उसने सुन रखा था कि लाओत्से के पास सभी समस्याओं का समाधान है। युवा सैनिक लाओत्से से जानना चाहता था कि स्वर्ग और नरक में क्या अंतर है? लाओत्से ने उसे अच्छी तरह देखा और पूछा, 'युवक तुम्हारा पेशा क्या है?' सैनिक ने अपने पेशे के बारे में बताया तो लाओत्से ने उसका उपहास करते हुए कहा, 'तुम और सैनिक! तुम्हें तो देखकर पता चलता है कि तुम बड़े डरपोक हो। तुम्हें तो बंदूक भी ठीक से उठाना नहीं आता होगा। तुमने तो शायद ही आज तक कोई वीरता का काम किया हो।' यह कहकर लाओत्से ने ठहाका लगाया।
इस पर सैनिक की भौंहें तन गई। उसका खून खौल उठा। उसने बंदूक निकाल ली और ज्यों ही घोड़ा दबाने को हुआ कि तभी लाओत्से बोल पड़े, 'बस यही है नरक का द्वार। तुम इससे आगे बढ़े नहीं कि नरक में पहुंच जाओगे।' इसके बाद लाओत्से ने विस्तार से क्रोध, उससे होने वाले नुकसान और क्रोध पर नियंत्रण की जरूरत पर चर्चा की। उन्होंने इस क्रम में उसे समझाते हुए कहा, 'स्वर्ग और नरक कहीं बाहर नहीं हैं। वे हमारे भीतर हैं। वे हमारी सोच और व्यवहार में प्रकट होते हैं।' लाओत्से की बात का मर्म समझते ही युवक की आंखें खुल गईं। वह अपने किए पर ग्लानि से भर गया और लाओत्से के चरणों में गिर पड़ा। लाओत्से ने कहा, 'लो, अब तुम्हारे लिए खुल गया स्वर्ग का द्वार। आगे बढ़ते ही तुम्हारा दुनिया की हर खुशियों से सामना होगा।'
वास्तविक खुशी:
नॉर्वे की महान लेखिका सिग्रिड अन्डसेट को 1928 का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा हुई। उस जमाने में आज की तरह व्यापक संचार साधन नहीं थे, इसलिए उन तक खबर देर शाम को पहुंची। पहली बार किसी महिला साहित्यकार को यह पुरस्कार हासिल हुआ था, इसलिए यह समाचार और भी मायने रखता था। देश-विदेश के कई पत्रकार सिग्रिड से बात करने को आतुर थे।
आखिरकार एक समाचार एजेंसी से जुड़े दो पत्रकार ओस्लो स्थित सिग्रिड के आवास पर उनसे बात करने जा पहुंचे। उस समय रात के नौ बजे थे। पत्रकारों ने काफी देर तक दरवाजा खटखटाया। आखिर सिग्रिड घर से बाहर आईं। पत्रकारों को देखकर वह बोलीं, 'मैं आपके आने का कारण समझ सकती हूं, लेकिन मुझे माफ कीजिए, मैं अभी आपसे बात नहीं कर सकती।' यह सुनकर पत्रकारों को बेहद आश्चर्य हुआ। कहां तो उन्हें यह लग रहा था कि सिग्रिड साक्षात्कार देने के लिए उत्सुक होंगी, पर वह तो दो बात करने तक के लिए तैयार नहीं थीं।
पत्रकारों ने उनसे पूछा, 'लेकिन आप अभी बात क्यों नहीं करना चाहतीं?' सिग्रिड ने कहा, 'क्षमा करें, यह समय मेरे बच्चों के सोने का है। अभी मैं उनके साथ ही समय बिताना पसंद करती हूं। पुरस्कार तो मुझे मिल ही चुका है और इससे मैं काफी खुश हूं, लेकिन यह उस खुशी के सामने फीकी है जो बच्चों के लिए निर्धारित समय में मुझे उनके साथ रहने में मिलती है।' पत्रकार खुशी की उनकी इस परिभाषा और सहजता से बेहद प्रभावित हुए। सुबह सिग्रिड ने उन पत्रकारों को ही सबसे पहले साक्षात्कार दिया।
वृक्ष का सम्मान:
गौतम बुद्ध एक दिन एक वृक्ष को नमन कर रहे थे। उनके एक शिष्य ने यह देखा तो उसे हैरानी हुई। वह बुद्ध से बोला, 'भगवन, आपने इस वृक्ष को नमन क्यों किया?' शिष्य की बात पर बुद्ध बोले, 'क्या इस वृक्ष को नमस्कार करने से कुछ अनहोनी घट गई?' शिष्य बुद्ध का जवाब सुनकर बोला, 'नहीं भगवन! ऐसी बात नहीं है, किंतु मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि आप जैसा महान व्यक्ति इस वृक्ष को नमस्कार क्यों कर रहा है? यह न तो आपकी बात का जवाब दे सकता है और न ही आपके नमन करने पर प्रसन्नता व्यक्त कर सकता है।'
शिष्य की बात पर बुद्ध ने कहा, 'भंते, तुम्हारा सोचना गलत है। वृक्ष मुझे जवाब बोल कर भले ही न दे सकता हो किंतु जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के शरीर की एक भाषा होती है, उसी प्रकार प्रकृति और वृक्षों की भी एक अलग भाषा होती है। अपना सम्मान होने पर वे झूम कर प्रसन्नता और कृतज्ञता दोनों ही व्यक्त करते हैं। इस वृक्ष के नीचे बैठकर मैंने साधना की, इसकी पत्तियों ने मुझे शीतलता प्रदान की, धूप से मेरा बचाव किया।हर पल इस वृक्ष ने मेरी सुरक्षा की। इसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना मेरा कर्त्तव्य है। प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति के प्रति सदैव कृतज्ञ बने रहना चाहिए क्योंकि प्रकृति व्यक्ति को सुंदर व सुघड़ जीवन प्रदान करती है। तुम जरा इस वृक्ष की ओर देखो कि इसने मेरी कृतज्ञता व धन्यवाद को बहुत ही खूबसूरती से ग्रहण किया है और जवाब में मुझे झूम कर यह बता रहा है कि आगे भी वह प्रत्येक व्यक्ति की हरसंभव सेवा करता रहेगा।'
बुद्ध की बात पर शिष्य ने वृक्ष को देखा तो उसे लगा कि सचमुच वृक्ष एक अलग ही मस्ती में झूम रहा था और उसकी झूमती हुए पत्तियां, शाखाएं व फूल मन को एक अद्भुत शांति प्रदान कर रहे थे। यह देखकर शिष्य स्वत: वृक्ष के सम्मान में झुक गया।
गांधीजी की आस्था:
गांधीजी सुबह उठ कर कभी - कभी कुरान का पाठ किया करते थे। सूरा - ए - फ़ातेहा उनको जुबानी याद था। इसको याद रखने के कारण तो एक बार उनकी जान भी बच गई थी। हुआ यूं कि जब बंगाल में सांप्रदायिक दंगों की भड़कती आग को ठंडा करने के लिए गांधीजी सड़कों पर लोगों से शांति का आग्रह कर रहे थे तो नोआखाली के बाबू बाजार में एक कट्टर मुसलमान ने गांधीजी को ' काफि़र ' पुकार कर उन पर हमला किया। गांधीजी , जो वैसे ही काफी दुबले - पतले थे और आए दिन व्रत - उपवास आदि भी रखते रहे थे , जमीन पर गिर गए और गिरते हुए उन्होंने सूरा - ए - फ़ातेहा को शुद्ध उच्चारण के साथ पढ़ा जिसमें सभी के लिए शांति व सलामती का संदेश है।
एक हिंदू को कुरान की आयत पढ़ते देख वह मुसलमान तुरंत उनके पांवों में पड़ गया और तब से उनका शिष्य बन गया। मौलाना आजाद के एक लेख से जो दैनिक ' वकील ' में प्रकाशित हुआ था , एक वाकया मिलता है कि नोआखाली में ही दंगा पर उतारू मुसलमानों के एक गुट से गांधी ने कहा , ' तुम कैसे मुसलमान हो ? क्या तुमने हजरत मुहम्मद से कोई शिक्षा ग्रहण नहीं की ? आज अगर हजरत मुहम्मद यहां आएं तो तुममें से बहुत से मुसलमानों को वे अपनाने से इनकार कर देंगे। तुम से तो अच्छा मुसलमान मैं हूं कि मारकाट नहीं कर रहा। वे अवश्य मुझे अपनाएंगे क्योंकि मैं उनके बताए रास्ते पर चल रहा हूं। '
जिस प्रकार से मौलाना आजाद की धर्म में अटूट आस्था थी , उसी प्रकार गांधीजी की भी थी। गांधीजी ने अपने पत्रों में मौलाना साहब को लिखा कि अपने छात्र जीवन से ही उन्हें गीता पाठ से आत्मिक व मानसिक शांति की प्राप्ति होती थी। हजरत मुहम्मद का चरित्र उन्हें बहुत पसंद था। अपने जीवन में भी वे उनका अनुसरण करते थे। गांधीजी हजरत मुहम्मद के चरित्र से कितना प्रभावित थे यह उनके लेखन से जाहिर है। गांधीजी ने अपने लेखन में हजरत मुहम्मद के विचारों को प्रमुखता से व्यक्त किया।
भूल का अहसास:
फारस का एक राजा कलाकारों का अत्यधिक सम्मानकरता था। उसके दरबार में दूर - दूर से चित्रकार ,मूर्तिकार , लेखक और कवि आदि आते और अपनीरचनाओं पर भरपूर प्रशंसा व पुरस्कार पाते थे। एक दिनग्रीस का एक ख्यात मूर्तिकार राजा के पास आया। उसनेराजा को तीन मूर्तियां भेंट कीं और बोला - राजन , जबतक ये तीनों मूर्तियाआपके दरबार में रहेंगी , तब तकआपके राज्य में सुख - समृद्धि बनी रहेगी। राजा ने प्रसन्नहोकर मूर्तिकार को इनाम में सोने के सिक्कों से भरा एकथैला दिया। राजा ने अपने सेवकों को उन मूर्तियों काध्यान से रख - रखाव करने का आदेश दिया। आदेश कायथाविधि पालन होने लगा।
एक राजा था। उसके मंत्री के दो पुत्र थे। बड़ा वाला अल्पबुद्धि का था जबकि छोटा तीव्र बुद्धि का। राजा ने छोटे को अपना दीवान नियुक्त कर दिया, जबकि बड़े को रसोई की जिम्मेवारी दे दी। मगर वह रसोई की व्यवस्था भी ढंग से न संभाल सका। कभी खाने में देर हो जाती तो कभी भोजन बेस्वाद बनता। छोटा भाई खाने को लेकर शिकायत करता तो बड़ा भाई कहता, 'खाना बनाना कलम चलाने जैसा आसान काम नहीं है।' एक दिन छोटे भाई ने पूछा, 'तो क्या आप मेरा काम कर लेंगे?' बड़े भाई ने सरलता से कहा, 'क्यों नहीं। जरूर करूंगा।' इस तरह दोनों ने काम की अदला-बदली कर ली। अब बड़ा भाई दरबार जाने लगा।
एक दिन राजा ने उसे सोने की एक डिबिया देकर कहा, 'तुम इसे मेरे मित्र राजा को देकर आना और उसका समाचार भी लेते आना।' बड़ा भाई पड़ोसी राज्य में गया और मित्र राजा को वह डिबिया दे दी। राजा ने डिबिया खोली तो उसमें मखमल में राख पड़ी थी। इस पर वह चौंका। उसने पूछा, 'दीवान जी, यह राख कैसी है?' बड़ा भाई मूर्ख और घमंडी तो था ही उसने झट से कहा, 'अगर आपने हमारे महाराज की अधीनता स्वीकार नहीं की तो आपका राज उसी तरह उड़ा दिया जाएगा जिस तरह फूंक मारने से राख उड़ जाती है।' यह सुनकर राजा आगबबूला हो गया।
उसने बड़े भाई को कैद कर लिया। जब छोटे भाई को इसका पता चला तो वह दौड़ता हुआ वहां पहुंचा। उसने राजा से कहा, 'आपको मेरे महाराज ने एक अनमोल उपहार भेजा था पर आपने उसकी कद नहीं की।' राजा ने कहा, 'उसमें तो राख है।' इस पर छोटे भाई ने कहा, 'हमारे महाराज ने एक यज्ञ कराया था। उसकी पूर्णाहुति पर उसकी राख को घनिष्ठ मित्र होने के कारण आपको भेजा था। इससे राज्य में शांति और समृद्धि आएगी।' यह सुनते ही राजा ने छोटे भाई से क्षमा मांगी और बड़े भाई को मुक्त कर दिया।
स्वर्ग का रास्ता:
किसी शहर में धार्मिक प्रवृत्ति का एक व्यक्ति रहता था। उसकी इच्छा थी कि इस जन्म में चाहे जो करना पड़े, लेकिन मरने के बाद उसे स्वर्ग अवश्य मिले, इसलिए वह गरीबों की सेवा करता, दान-दक्षिणा देता, कमाई का अधिकांश भाग परोपकार में ही लगा देता। लेकिन जैसे-जैसे उसकी परोपकार की भावना का विकास हो रहा था वैसे ही उसमें अहंकार भी बढ़ रहा था। कोई उसकी दानशीलता पर टीका-टिप्पणी कर देता तो उसके क्रोध की सीमा न रहती। एक बार एक प्रसिद्ध संत उसके घर के पास आकर रुके तो वह फौरन उनकी सेवा में उपस्थित हो गया और उनसे भी स्वर्ग जाने का उपाय पूछने लगा।
संत ने उस व्यक्ति को ध्यानपूर्वक ऊपर से नीचे तक देखा और उपेक्षा से कहा, 'तुम स्वर्ग जाओगे? तुम तो देखकर ही लंपट मालूम पड़ रहे हो। तुम परोपकारी या दानी व्यक्ति नहीं धर्म के ठेकेदार ज्यादा लग रहे हो।' इतना सुनते ही वह व्यक्ति क्रोध से भर उठा और उसने संत को मारने के लिए डंडा उठा लिया। संत ने मुस्कराते हुए कहा,' तुम में तो तनिक भी धैर्य नहीं। इतनी अधीरता और अहंकार के होते हुए तुम स्वर्ग कैसे जा पाओगे?' व्यक्ति को संत की कही हुई बातों का मर्म समझ में आ गया तो वह संत के चरणों में गिर पड़ा और अपनी गलती के लिए क्षमा मांगने लगा। उसने आगे से कभी क्रोध न करने तथा अहंकार वृत्ति के त्याग का भी प्रण किया। संत ने कहा, 'जिस दिन तुम सब अवगुणों से मुक्त हो जाओगे उस दिन स्वर्ग की सृष्टि यहीं पर हो जाएगी।'
इंसानियत की मिसाल:
बहुत दिनों से पड़ोस के एक बादशाह से हजरत उमर की लड़ाई चल रही थी। संधि करने का प्रस्ताव आया तो हजरत उमर एक ऊंट पर चढ़कर रवाना हो गए। ऊंट की नकेल पकड़ने वाला एक गुलाम भी उनके साथ था। चार कोस चलने के बाद हजरत उमर ऊंट से नीचे उतरे और गुलाम के हाथ से नकेल लेकर बोले, 'चलो, अब तुम ऊंट पर बैठ जाओ। नकेल पकड़ कर मैं चलूंगा।'
गुलाम की समझ में कुछ न आया। उसने कहा, 'मालिक, यह कैसे हो सकता है?' हजरत उमर ने कहा, 'क्यों नहीं हो सकता? चलने से तो सभी थकते हैं। तुम थक जाओ तो ऊंट पर बैठ जाओ। जब मैं थक जाऊंगा तो मैं ऊंट पर बैठ जाऊंगा। यहां भेदभाव का सवाल ही कहां है? आखिर हम दोनों इंसान हैं और दोनों की तकलीफें एक हैं।' लाख इनकार करने पर भी गुलाम को ऊंट पर बैठना ही पड़ा। इस तरह चार-चार कोस पर दोनों अपनी स्थिति बदलते रहे।
चढ़ते-उतरते हजरत उमर उस बादशाह की राजधानी में जा पहुंचे। संयोग ही था कि जब वे लोग शहर में दाखिल हुए, तब गुलाम ऊंट की पीठ पर था और हजरत उमर ऊंट की नकेल पकड़े हुए थे। वहां के वजीर ने आकर गुलाम को सलाम किया तो गुलाम ने परेशान होकर कहा, 'जी, मैं तो गुलाम हूं। बादशाह हजरत तो वह हैं, जो ऊंट की नकेल पकड़े खड़े हैं।' यह सुनकर सब हैरान रह गए। चारों तरफ यह बात फैल गई। लोग समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर यह माजरा क्या है? जब यह किस्सा वहां के बादशाह तक पहुंचा तो वह भी हैरत में पड़ गया। वह दौड़कर हजरत उमर के पास पहुंचा। उसने उमर का सम्मानपूर्वक स्वागत किया और कहा, 'जो बादशाह अपने गुलाम के साथ ऐसा व्यवहार करता है, उससे कैसी लड़ाई और कैसी संधि? आज से हजरत उमर मेरे उस्ताद हैं, और मैं उनका शागिर्द।'
शरीर बहुत प्राचीन है, बहुत ही प्राचीन ... क्योंकि कभी तम एक पत्थर की तरह जीते थे––शरीर तो था लेकिन मन सोया हुआ था। फिर तुम एक पेड़ हुए; शरीर था उसकी पूरी हरियाली और फूलों के साथ। लेकिन मन अभी भी गहरी नींद सोया था; पत्थर की तरह न सही लेकिन फिर भी सोया तो था। फिर तुम बाघ हुए, पशु हुए,; शरीर ऊर्जा से इतना ओतप्रोत था लेकिन मन काम नहीं कर रहा था। तुम पक्षी हुए, मनुष्य हुए ... शरीर लाखों साल से कार्यरत है। शरीर ने अत्यधिक प्रज्ञा इकट्ठी कर ली है। शरीर बहुत प्रज्ञावान है। इसलिए यदि तुम बहुत ज्यादा खाते हो तो शरीर कहता है, " रुक जाओ!" मन इतना बुद्धिमान नहीं है। मन कहता है, "स्वाद अच्छा है, थोड़ा अधिक लो।" अगर तुम मन की सुनते हो तो तो मन शरीर का नुकसान करता है किसी न किसी प्रकार से। यदि तुम मन की सुनोगे, तब मन पहले तो कहेगा, " खाये जाओ।" क्योंकि मन मूर्ख है, बच्चा है। वह नहीं जानता वह क्या कह रहा है। वह नया-नया आया है। उसके भीतर कोई शिक्षा नहीं है। वह बुद्धिमान नहीं है, वह अभी भी मूर्ख है। शरीर की सुनो। जब शरीर कहता है, भूख लगी है तब खाओ। जब शरीर कहता है, रुक जाओ, तब रुको।
जब तुम मन की सुनते हो तो यह ऐसा है जैसे एक छोटा बच्चा एक बूढ़े आदमी को राह दिखा रहा है, वे दोनों गड्ढे में गिरेंगे। अगर तुम मन की सुनोगे तो पहले तुम इंद्रियों में गिर जाओगे और फिर तुम उससे ऊब जाओगे। हर इंद्रिय तुम्हारे लिए दुख ले आएगी और हर इंद्रिय अधिक चिंता, क्लेश और पीड़ा ले आएगी। अगर तुमने बहुत ज्यादा खा लिया तो पीड़ा होगी और फिर उलटी हो जाएगी। पूरा शरीर अस्तव्यस्त हो जाता है। तब मन कहता है, "भोजन बुरा है, इसलिए उपवास करो।" और उपवास सदा खतरनाक होता है। अगर तुम शरीर की सुनो तो वह कभी ज्यादा नहीं खाएगा और न कभी कम खाएगा; वह सिर्फ ताओ का अनुसरण करेगा।
कुछ वैज्ञानिक इस समस्या पर काम कर रहे हैं और उन्होंने बहुत सुंदर तथ्य की खोज की है: छोटे बच्चे तभी खाते हैं जब वे भूखे होते हैं, वे तभी सोते हैं जब उन्हें नींद आती है। वे अपने शरीर की सुनते हैं। लेकिन उनके माता-पिता उनमें बाधा डालते हैं। वे जबरदस्ती करते हैं कि यह भोजन का समय है, या लंच का समय है, या सोने का समय है.... अब जाओ! वे उनके शरीर को मुक्त नहीं छोड़ते।
एक अन्वेषक ने बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया। वह पच्चीस बच्चों पर काम कर रहा था। उन पर सोने की जबरदस्ती, या उठने की जबरदस्ती नहीं की गई। छह महीने तक उन पर कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की गई। और एक गहन समझ विकसित हुई।
वे गहरी नींद सोए , उन्हें कम सपने आए, कोई डरावने सपने नहीं आए , क्योंकि डरावने सपने मां-बाप के कारण आ रहे थे जो उन पर जबरदस्ती करते थे। उन्होंने खाना ठीक से खाया, न जरूरत से ज्यादा न कम । उहोंने खाने का मज़ा लिया और कभी-कभी वे खाना बिलकुल नहीं खाते। जब शरीर राजी नहीं होता तो वे खाना नहीं खाते। और भोजन के कारण होनेवाली बीमारी से वे बीमार नहीं हुए।
इससे एक बात समझ में आई जिसका किसी को शक भी नहीं हुआ था और वह चमत्कार था। सिर्फ सोसान इसे समझ सकता है, या लाओत्ज़ु या च्वांग्त्ज़ु। क्योंकि ये लोग ताओ के अधिकारी हैं। यह ऐसी अद्भुत खोज थी। उन्हें यह समझ आई कि जब बच्चा बीमार हो तो वह एक खास तरह का खाना नहीं खाता। फिर उन्होंने समझने की कोशिश की कि वह ये चीजें क्यों नहीं खा रहा है। उनका जब विश्लेषण किया गया तब पाया गया कि उस बीमारी के लिए वह भोजन हानि कारक है। अब बच्चे ने कैसे तय किया? सिर्फ शरीर के कारण ....
जब बच्चा बड़ा हो रहा था तब उसके विकास के लिए जो भी जरूरी था उसे वह ज्यादा खाता था। फिर उन्होंने भोजन का विश्लेषण किया और पाया कि ये चीजें सहयोगी थीं। भोजन बदल जाता क्योंकि जरूरतें बदल जातीं। एक दिन बच्चा कुछ खाता और दूसरे दिन वही बच्चा उसे नहीं खाता था। और वैज्ञानिकों को अहसास हुआ कि शरीर की प्रज्ञा होती है।
अगर तुम शरीर को उसके हिसाब से चलने दो तो तुम सही रास्ते पर हो, राज मार्ग पर। और यह सिर्फ भोजन के बारे में सच नहीं है, यह पूरे जीवन के बारे में सच है। तुम्हारा सेक्स विकृत होता है तुम्हारे मन के कारण, तुम्हारा पेट गड़बड़ होता है तुम्हारे मन के कारण। तुम शरीर में हस्तक्षेप करते हो। हस्तक्षेप मत करो! अगर तीन महीने तक भी इसका पालन कर सको कि हस्तक्षेप मत करो तो अकस्मात तुम स्वस्थ हो जाओगे, और तुम्हारे ऊपर एक आंतरिक स्वास्थ्य उतरेगा। सब कुछ ठीक नजर आएगा। जैसे जूता पैर में फिट हो गया। लेकिन मन समस्या है।
अगार तुम इंद्रियों की सुनोगे तो तुम सरल हो जाओगे। निश्चय ही कोई तुम्हें आदर नहीं देगा क्योंकि वे कहेंगे, "यह भोगी आदमी है।" एक भोगी आदमी गैरभोगी आदमी से अधिक जीवंत होता है। शरीर की सुनो। क्योंकि यहां तुम इस क्षण का आनंद लेने के लिए हो जो तुम्हें मिला है, यह प्रसादपूर्ण क्षण, यह धन्यता जो तुम्हारे साथ घटी है। तुम जीवंत हो, जागरूक हो, और इतने विराट विश्व में।
इस छोटे से ग्रह पर, बहुत छोटे, नन्हे से ग्रह पर मनुष्य एक चमत्कार है। सूरज साठ गुना ज्यादा बड़ा है इस पृथ्वी से। और यह सूरज सामान्य है, ऐसे लाखों सूरज हैं और लाखों विश्व और ब्रह्माण्ड हैं। अब तक ऐसा लगता है, जहां तक विज्ञान की पहुंच है, कि जीवन और चेतना सिर्फ इस धरती पर घटी है। यह धरती धन्य है।
तुम्हें पता नहीं है तुमने क्या पाया है। यदि तुम्हें इसका अहसास हो कि तुमने क्या पाया है, तुम बहुत कृतज्ञ होओगे और इससे अधिक कुछ नहीं मांगोगे। तुम एक चट्टान भी हो सकते थे और तुम इसके बाबत कुछ नहीं कर सकते थे। तुम एक मनुष्य हो। और तुम दुख झेल रहे हो, और तुम चिंतित हो और तुम पूरी बात ही चूक रहे हो। इस क्षण का आनंद लो क्योंकि यह क्षण दुबारा नहीं आएगा।
हिंदुओं का यही अभिप्राय है: वे कहते हैं, तुम फिर से चट्टान बन जाओगे। अगर तुम आनंद नहीं लोगे और विकसित नहीं होओगे तो तुम नीचे गिर जाओगे। तुम एक जानवर बन जाओगे। यह अर्थ है: हमेशा याद रखना कि चेतना की यह चरम दशा एक ऐसा शिखर है: अगर तुम इसका आनंद नहीं लेते या इससे केंद्रित नहीं होते तो तुम नीचे गिर जाओगे।
गुर्जिएफ कहता था कि अभी तुम्हारे पास आत्मा नहीं है; जीवन केवल एक अवसर है उसे पाने का, आत्मवान होने का। और कौन जाने यह अवसर फिर कब मिलेगा या नहीं मिलेगा? कोई नहीं जान सकता, कोई है ही नहीं जो इसके बारे में कुछ कह सकता है।
इतना ही कहा जा सकता है कि इस क्षण यह मौका तुम्हें मिला है। यदि तुम इसका आनंद लेते हो, यदि तुम उसमें मस्त हो जाते हो, कृतज्ञता अनुभव करते हो तो वह और सघन हो जाएगा। तुमहरे पास जो भी है वह बहुत ज्यादा है। अनुगृहीत होने के लिए आभारी होने के लिए यह काफी है। अस्तित्व से और मत मांगो। तुम्हें जो मिला है उसका मज़ा लो। और तुम जितना मज़ा लोगे उतना तुम्हें और दिया जाएगा।
जीसस एक बहुत विरोधाभासी बात कहते हैं, " यदि तुम्हारे पास अधिक है तो तुम्हें और अधिक दिया जाएगा, और तुम्हारे पास अगर कुछ नहीं है तो जो तुम्हारे पास है वह भी छीन लिया जाएगा। " यह तो बेतुका मालूम होता है। किस तरह का गणित है यह? " यदि तुम्हारे पास अधिक है तो तुम्हें और अधिक दिया जाएगा, और तुम्हारे पास अगर कुछ नहीं है तो जो तुम्हारे पास है वह भी छीन लिया जाएगा।" लगता है यह धनवान आदमी के लिए है और गरीब आदमी के विपरीत है।
इसका सामान्य अर्थशास्त्र से कोई संबंध नहीं है, यह तो जीवन का परम अर्थशास्त्र है। जिनके पास है उन्हें अधिक दिया जाएगा क्योंकि जितना वे मज़ा लेंगे उतना वह बढ़ेगा। जीवन विकसित होता है आनंद के कारण। प्रसन्नता सूत्र है। प्रसन्न होओ, अंनुगृहीत होओ जो भी है उसके प्रति। जो भी! उसमें मस्त हो जाओ, फिर और खुलता है, तुम्हारे ऊपर और गिरता है। तुम इस योग्य हो जाते हो कि तुम्हारे ऊपर और आशीष उतरे। जो अनुगृहीत नहीं है वह उसे भी खो देगा जो उसके पास है। जो अनुगृहीत है उसे समूचा अस्तित्व मदद करेगा कि वह अधिक विकसित हो क्योंकि वह योग्य है और उसे उसकी कदर है जो उसे मिला है।
(ओशो, द बुक ऑफ नथिंग:सिन सिन मिंग प्रवचन #6)
गुरु और शिष्य:
एक बार शिवाजी और समर्थ गुरु रामदास बरसात के मौसम में एक उफनती नदी के किनारे नदी पार करने के लिए खडे़ थे। दोनों में बहस हो रही थी कि मैं नदी को पहले पार करूंगा। इसी दौरान दैवयोग से एक नाविक भी वहां पहुंच गया। उसने उन्हें नदी के पार पहुंचा दिया। पार पहुंचने पर शिवाजी ने रामदास से पूछा, 'गुरुदेव, आप पहले नदी पार करने के लिए क्यों आतुर हो रहे थे?' रामदास ने बड़ी गंभीरता से शिवाजी से कहा, 'तुम्हीं बताओ कि तुम मुझसे पहले नदी में उतरने को क्यों तैयार थे?'
शिवाजी बिना कुछ कहे गंभीर मुद्रा में गुरु के समक्ष खडे़ रहे। फिर गुरु महाराज ने कहा, 'शिवाजी, तुम हिंदू धर्म-संस्कृति के रक्षक, प्रजापालक राजा हो। यदि नदी पार करते समय तुम तेज बहाव में कहीं बह जाते तो इस राज्य और धर्म का क्या होता? यदि मैं पहले नदी पार करते समय डूब भी जाता तो कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था क्योंकि मै अकेला प्राणी हूं।' यह सुनकर शिवाजी उनके चरणों पर गिर पड़े और बोले, 'गुरुदेव आपके बिना कैसा धर्म, कैसी संस्कृति और कैसा राष्ट्र? मेरे मर जाने से आप जैसे सद्गुरु एक नहीं हजारों शिवाओं को तैयार कर सकते हैं। मैं तो आपके चरणों का दास हूं और कुछ नहीं।' शिवाजी के ये वाक्य सुनकर समर्थ गुरू रामदास गदगद हो गए। उन्होंने शिवाजी को गले लगा लिया और कहा, 'तुम धर्म और मर्यादा को अच्छी तरह जानते हो। जहां तुम जैसे समर्पित राष्ट्रभक्त होंगे वह राष्ट्र हमेशा पूरे विश्व का मार्गदर्शन करता रहेगा।'
मजबूत नींव :
राजा समर सिंह को अपनी प्रजा से अधिक प्रिय धन-सम्पत्ति एकत्र करना था। उन्होंने अपनी अधिकतर संपत्ति को महल की सुंदरता बढ़वाने में लगवाया था। जो भी आता वह उनके महल की प्रशंसा किए बिना नहीं रहता था। राजा समर सिंह का मंत्री चतुर सिंह बेहद समझदार था। वह राजा की इस आदत से परेशान था। एक दिन उसने सुना कि उनके नगर में एक युवा संन्यासी आया हुआ है और वह हर किसी की मुसीबत का समाधान कर देता है। वह भी युवा संन्यासी से मिलने पहुंचा और बोला, 'महाराज, हमारे राजा अपने नगर को मजबूत बनाने के बजाय महल के रखरखाव पर अधिक धन खर्च करते हैं। उन्हें प्रजा की सुरक्षा से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे में शत्रु भी अवसर देखकर आक्रमण करने को तैयार रहते हैं। कृपया राजा का इस प्रकार से मार्गदर्शन करें कि उन्हें सही-गलत की पहचान हो जाए और वह अपनी प्रजा की समुचित देखभाल करते हुए देश की संपत्ति को महल के रखरखाव पर खर्च करने के बजाय जरूरी कार्यों पर खर्च करें।'
संन्यासी ने मंत्री को आश्वासन दिया और कहा कि वह स्वयं महल में आएगा और राजा से बात करेगा। मंत्री वहां से चला आया। अगले दिन नियत समय पर वह संन्यासी महल में पधारा। उसका खूब स्वागत-सत्कार किया गया। राजा ने संन्यासी को पूरा मान-सम्मान दिया। किंतु उसे बार-बार एक बात खलती रही कि संन्यासी ने एक बार भी उसके महल की तारीफ नहीं की। अभी तक उसे अपने जीवन में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला था जिसने उसके महल की दिल खोलकर तारीफ न की हो।
आखिर राजा से न रहा गया और वह बोल ही पड़ा, 'महाराज, क्या मेरे महल में कोई कमी है जो आपने इसकी प्रशंसा में एक भी शब्द नहीं बोला।' संन्यासी यह सुनकर बोला, 'राजन्, तुम्हारा महल सच में बहुत सुंदर व मजबूत है। यह बहुत लंबे समय तक नष्ट नहीं होगा, लेकिन यह बताइए कि क्या इसमें रहने वाला भी लंबे समय तक जीवित रहेगा। इसलिए महल की नींव मजबूत बनाने से पहले व्यक्ति को अपनी नींव मजबूत बनानी चाहिए। क्योंकि नींव मजबूत होने पर उसके जाने के बाद भी सदियों तक उसे याद किया जाता रहेगा।' यह सुनकर राजा की आंखें खुल गईं और उसे अपनी गलती का अहसास हो गया।
स्वर्ग और नरक: |
लाओत्से के पास एक युवा सैनिक, जिसने धर्मशास्त्रों का भी अध्ययन किया था, पहुंचा। उसने सुन रखा था कि लाओत्से के पास सभी समस्याओं का समाधान है। युवा सैनिक लाओत्से से जानना चाहता था कि स्वर्ग और नरक में क्या अंतर है? लाओत्से ने उसे अच्छी तरह देखा और पूछा, 'युवक तुम्हारा पेशा क्या है?' सैनिक ने अपने पेशे के बारे में बताया तो लाओत्से ने उसका उपहास करते हुए कहा, 'तुम और सैनिक! तुम्हें तो देखकर पता चलता है कि तुम बड़े डरपोक हो। तुम्हें तो बंदूक भी ठीक से उठाना नहीं आता होगा। तुमने तो शायद ही आज तक कोई वीरता का काम किया हो।' यह कहकर लाओत्से ने ठहाका लगाया।
इस पर सैनिक की भौंहें तन गई। उसका खून खौल उठा। उसने बंदूक निकाल ली और ज्यों ही घोड़ा दबाने को हुआ कि तभी लाओत्से बोल पड़े, 'बस यही है नरक का द्वार। तुम इससे आगे बढ़े नहीं कि नरक में पहुंच जाओगे।' इसके बाद लाओत्से ने विस्तार से क्रोध, उससे होने वाले नुकसान और क्रोध पर नियंत्रण की जरूरत पर चर्चा की। उन्होंने इस क्रम में उसे समझाते हुए कहा, 'स्वर्ग और नरक कहीं बाहर नहीं हैं। वे हमारे भीतर हैं। वे हमारी सोच और व्यवहार में प्रकट होते हैं।' लाओत्से की बात का मर्म समझते ही युवक की आंखें खुल गईं। वह अपने किए पर ग्लानि से भर गया और लाओत्से के चरणों में गिर पड़ा। लाओत्से ने कहा, 'लो, अब तुम्हारे लिए खुल गया स्वर्ग का द्वार। आगे बढ़ते ही तुम्हारा दुनिया की हर खुशियों से सामना होगा।'
वास्तविक खुशी:
नॉर्वे की महान लेखिका सिग्रिड अन्डसेट को 1928 का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा हुई। उस जमाने में आज की तरह व्यापक संचार साधन नहीं थे, इसलिए उन तक खबर देर शाम को पहुंची। पहली बार किसी महिला साहित्यकार को यह पुरस्कार हासिल हुआ था, इसलिए यह समाचार और भी मायने रखता था। देश-विदेश के कई पत्रकार सिग्रिड से बात करने को आतुर थे।
आखिरकार एक समाचार एजेंसी से जुड़े दो पत्रकार ओस्लो स्थित सिग्रिड के आवास पर उनसे बात करने जा पहुंचे। उस समय रात के नौ बजे थे। पत्रकारों ने काफी देर तक दरवाजा खटखटाया। आखिर सिग्रिड घर से बाहर आईं। पत्रकारों को देखकर वह बोलीं, 'मैं आपके आने का कारण समझ सकती हूं, लेकिन मुझे माफ कीजिए, मैं अभी आपसे बात नहीं कर सकती।' यह सुनकर पत्रकारों को बेहद आश्चर्य हुआ। कहां तो उन्हें यह लग रहा था कि सिग्रिड साक्षात्कार देने के लिए उत्सुक होंगी, पर वह तो दो बात करने तक के लिए तैयार नहीं थीं।
पत्रकारों ने उनसे पूछा, 'लेकिन आप अभी बात क्यों नहीं करना चाहतीं?' सिग्रिड ने कहा, 'क्षमा करें, यह समय मेरे बच्चों के सोने का है। अभी मैं उनके साथ ही समय बिताना पसंद करती हूं। पुरस्कार तो मुझे मिल ही चुका है और इससे मैं काफी खुश हूं, लेकिन यह उस खुशी के सामने फीकी है जो बच्चों के लिए निर्धारित समय में मुझे उनके साथ रहने में मिलती है।' पत्रकार खुशी की उनकी इस परिभाषा और सहजता से बेहद प्रभावित हुए। सुबह सिग्रिड ने उन पत्रकारों को ही सबसे पहले साक्षात्कार दिया।
वृक्ष का सम्मान:
गौतम बुद्ध एक दिन एक वृक्ष को नमन कर रहे थे। उनके एक शिष्य ने यह देखा तो उसे हैरानी हुई। वह बुद्ध से बोला, 'भगवन, आपने इस वृक्ष को नमन क्यों किया?' शिष्य की बात पर बुद्ध बोले, 'क्या इस वृक्ष को नमस्कार करने से कुछ अनहोनी घट गई?' शिष्य बुद्ध का जवाब सुनकर बोला, 'नहीं भगवन! ऐसी बात नहीं है, किंतु मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि आप जैसा महान व्यक्ति इस वृक्ष को नमस्कार क्यों कर रहा है? यह न तो आपकी बात का जवाब दे सकता है और न ही आपके नमन करने पर प्रसन्नता व्यक्त कर सकता है।'
शिष्य की बात पर बुद्ध ने कहा, 'भंते, तुम्हारा सोचना गलत है। वृक्ष मुझे जवाब बोल कर भले ही न दे सकता हो किंतु जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के शरीर की एक भाषा होती है, उसी प्रकार प्रकृति और वृक्षों की भी एक अलग भाषा होती है। अपना सम्मान होने पर वे झूम कर प्रसन्नता और कृतज्ञता दोनों ही व्यक्त करते हैं। इस वृक्ष के नीचे बैठकर मैंने साधना की, इसकी पत्तियों ने मुझे शीतलता प्रदान की, धूप से मेरा बचाव किया।हर पल इस वृक्ष ने मेरी सुरक्षा की। इसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना मेरा कर्त्तव्य है। प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति के प्रति सदैव कृतज्ञ बने रहना चाहिए क्योंकि प्रकृति व्यक्ति को सुंदर व सुघड़ जीवन प्रदान करती है। तुम जरा इस वृक्ष की ओर देखो कि इसने मेरी कृतज्ञता व धन्यवाद को बहुत ही खूबसूरती से ग्रहण किया है और जवाब में मुझे झूम कर यह बता रहा है कि आगे भी वह प्रत्येक व्यक्ति की हरसंभव सेवा करता रहेगा।'
बुद्ध की बात पर शिष्य ने वृक्ष को देखा तो उसे लगा कि सचमुच वृक्ष एक अलग ही मस्ती में झूम रहा था और उसकी झूमती हुए पत्तियां, शाखाएं व फूल मन को एक अद्भुत शांति प्रदान कर रहे थे। यह देखकर शिष्य स्वत: वृक्ष के सम्मान में झुक गया।
गांधीजी की आस्था:
गांधीजी सुबह उठ कर कभी - कभी कुरान का पाठ किया करते थे। सूरा - ए - फ़ातेहा उनको जुबानी याद था। इसको याद रखने के कारण तो एक बार उनकी जान भी बच गई थी। हुआ यूं कि जब बंगाल में सांप्रदायिक दंगों की भड़कती आग को ठंडा करने के लिए गांधीजी सड़कों पर लोगों से शांति का आग्रह कर रहे थे तो नोआखाली के बाबू बाजार में एक कट्टर मुसलमान ने गांधीजी को ' काफि़र ' पुकार कर उन पर हमला किया। गांधीजी , जो वैसे ही काफी दुबले - पतले थे और आए दिन व्रत - उपवास आदि भी रखते रहे थे , जमीन पर गिर गए और गिरते हुए उन्होंने सूरा - ए - फ़ातेहा को शुद्ध उच्चारण के साथ पढ़ा जिसमें सभी के लिए शांति व सलामती का संदेश है।
एक हिंदू को कुरान की आयत पढ़ते देख वह मुसलमान तुरंत उनके पांवों में पड़ गया और तब से उनका शिष्य बन गया। मौलाना आजाद के एक लेख से जो दैनिक ' वकील ' में प्रकाशित हुआ था , एक वाकया मिलता है कि नोआखाली में ही दंगा पर उतारू मुसलमानों के एक गुट से गांधी ने कहा , ' तुम कैसे मुसलमान हो ? क्या तुमने हजरत मुहम्मद से कोई शिक्षा ग्रहण नहीं की ? आज अगर हजरत मुहम्मद यहां आएं तो तुममें से बहुत से मुसलमानों को वे अपनाने से इनकार कर देंगे। तुम से तो अच्छा मुसलमान मैं हूं कि मारकाट नहीं कर रहा। वे अवश्य मुझे अपनाएंगे क्योंकि मैं उनके बताए रास्ते पर चल रहा हूं। '
जिस प्रकार से मौलाना आजाद की धर्म में अटूट आस्था थी , उसी प्रकार गांधीजी की भी थी। गांधीजी ने अपने पत्रों में मौलाना साहब को लिखा कि अपने छात्र जीवन से ही उन्हें गीता पाठ से आत्मिक व मानसिक शांति की प्राप्ति होती थी। हजरत मुहम्मद का चरित्र उन्हें बहुत पसंद था। अपने जीवन में भी वे उनका अनुसरण करते थे। गांधीजी हजरत मुहम्मद के चरित्र से कितना प्रभावित थे यह उनके लेखन से जाहिर है। गांधीजी ने अपने लेखन में हजरत मुहम्मद के विचारों को प्रमुखता से व्यक्त किया।
भूल का अहसास:
फारस का एक राजा कलाकारों का अत्यधिक सम्मानकरता था। उसके दरबार में दूर - दूर से चित्रकार ,मूर्तिकार , लेखक और कवि आदि आते और अपनीरचनाओं पर भरपूर प्रशंसा व पुरस्कार पाते थे। एक दिनग्रीस का एक ख्यात मूर्तिकार राजा के पास आया। उसनेराजा को तीन मूर्तियां भेंट कीं और बोला - राजन , जबतक ये तीनों मूर्तियाआपके दरबार में रहेंगी , तब तकआपके राज्य में सुख - समृद्धि बनी रहेगी। राजा ने प्रसन्नहोकर मूर्तिकार को इनाम में सोने के सिक्कों से भरा एकथैला दिया। राजा ने अपने सेवकों को उन मूर्तियों काध्यान से रख - रखाव करने का आदेश दिया। आदेश कायथाविधि पालन होने लगा।
एक दिन एक सेवक के हाथ से सफाई करते वक्त एक मूर्तिगिरकर टूट गई। राजा को जैसे ही यह बात पता चली वहआगबबूला हो गया और उसने सेवक को मौत की सजा सुनाई। आदेश का सुनना था कि उस सेवक ने बाकी दोमूर्तियां भी पटक कर तोड़ डालीं। राजा इस गुस्ताखी से और भी गुस्से में आ गया , लेकिन साथ ही उसके इसकृत्य से वह आश्चर्यचकित भी था। किसी तरह अपनी भावनाओं पर काबू पा उसने इसका कारण पूछा। सेवकबोला - किसी न किसी के हाथ से तो ये मूर्तियां भी टूटनी ही थीं , इसलिए ऐसा करके मैंने दो अन्य व्यक्तियों कोमौत के मुंह में जाने से बचा लिया है। सेवक की बात सुन राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने अपनेआंख खोलने वाले उस सेवक को न केवल क्षमा किया , उसे दरबार में महत्वपूर्ण स्थान भी दिया।
संकल्प और समर्पण:
यशोधर्म एक प्रसिद्ध संत थे। अनेक शिष्य उनसे ज्ञान प्राप्त करने के लिए आतुर रहते थे। एक दिन जब वह अपने शिष्यों को पढ़ा रहे थे तो एक शिष्य बोला, 'अध्यात्म मार्ग में गति पाने के लिए व्यक्ति को क्या करना चाहिए?' शिष्य का प्रश्न सुनकर संत यशोधर्म बोले, 'जैसे पक्षी को उड़ान भरने के लिए दो पंखों की आवश्यकता होती है उसी तरह अध्यात्म का मार्ग पाने के लिए भी व्यक्ति को संकल्प एवं समर्पण रूपी दो पंखों की आवश्यकता होती है। इनके अभाव में कोई भी व्यक्ति अध्यात्म की राह नहीं पा सकता।
यह सुनकर शिष्य बोला, 'गुरुजी, क्या अकेले संकल्प या समर्पण से अध्यात्म लाभ नहीं हो सकता?' यशोधर्म बोले, 'आओ, नौका विहार करते हैं । इसका जवाब मैं तुम्हें वहीं दूंगा।' यह सुनकर शिष्य संत के साथ नौका विहार के लिए तैयार हो गया। वह संत के साथ नौका स्थल पर पहुंचा तो यशोधर्म बोले, 'नाव मैं चलाता हूं।' यह कह कर उन्होंने एक ही पतवार से नाव खेनी शुरू कर दी। आधा घंटा बीत गया, नाव वहीं गोल-गोल घूमने लगी। काफी देर बीतने के बाद शिष्य बोला, 'गुरुजी, यह आप क्या कर रहे हैं? कहीं एक पतवार से भी नाव चलती है। ऐसे तो हम यहीं चक्कर खाते रहेंगे और कभी भी किनारे तक नहीं पहुंच पाएंगे।' शिष्य की बात सुनकर संत यशोधर्म मुस्कराते हुए बोले, 'अब तुम्हीं बताओ जब नौका की एक पतवार हमें किनारे तक नहीं पहुंचा सकती तो खाली अकेले संकल्प या समर्पण का सहारा लेकर तुम अध्यात्म के मार्ग तक कैसे पहुंच सकते हो? जिस तरह दोनों पतवारों के बिना नाव खेना संभव नहीं है उसी तरह संकल्प एवं समर्पण के बिना अध्यात्म का मार्ग पाना भी संभव नहीं है।' संत यशोधर्म की इस बात से शिष्य की आंखें खुल गईं और वह समझ गया कि अध्यात्म के मार्ग के लिए संकल्प एवं समर्पण दोनों ही अनिवार्य हैं।
अनमोल उपहार:संकल्प और समर्पण:
यशोधर्म एक प्रसिद्ध संत थे। अनेक शिष्य उनसे ज्ञान प्राप्त करने के लिए आतुर रहते थे। एक दिन जब वह अपने शिष्यों को पढ़ा रहे थे तो एक शिष्य बोला, 'अध्यात्म मार्ग में गति पाने के लिए व्यक्ति को क्या करना चाहिए?' शिष्य का प्रश्न सुनकर संत यशोधर्म बोले, 'जैसे पक्षी को उड़ान भरने के लिए दो पंखों की आवश्यकता होती है उसी तरह अध्यात्म का मार्ग पाने के लिए भी व्यक्ति को संकल्प एवं समर्पण रूपी दो पंखों की आवश्यकता होती है। इनके अभाव में कोई भी व्यक्ति अध्यात्म की राह नहीं पा सकता।
यह सुनकर शिष्य बोला, 'गुरुजी, क्या अकेले संकल्प या समर्पण से अध्यात्म लाभ नहीं हो सकता?' यशोधर्म बोले, 'आओ, नौका विहार करते हैं । इसका जवाब मैं तुम्हें वहीं दूंगा।' यह सुनकर शिष्य संत के साथ नौका विहार के लिए तैयार हो गया। वह संत के साथ नौका स्थल पर पहुंचा तो यशोधर्म बोले, 'नाव मैं चलाता हूं।' यह कह कर उन्होंने एक ही पतवार से नाव खेनी शुरू कर दी। आधा घंटा बीत गया, नाव वहीं गोल-गोल घूमने लगी। काफी देर बीतने के बाद शिष्य बोला, 'गुरुजी, यह आप क्या कर रहे हैं? कहीं एक पतवार से भी नाव चलती है। ऐसे तो हम यहीं चक्कर खाते रहेंगे और कभी भी किनारे तक नहीं पहुंच पाएंगे।' शिष्य की बात सुनकर संत यशोधर्म मुस्कराते हुए बोले, 'अब तुम्हीं बताओ जब नौका की एक पतवार हमें किनारे तक नहीं पहुंचा सकती तो खाली अकेले संकल्प या समर्पण का सहारा लेकर तुम अध्यात्म के मार्ग तक कैसे पहुंच सकते हो? जिस तरह दोनों पतवारों के बिना नाव खेना संभव नहीं है उसी तरह संकल्प एवं समर्पण के बिना अध्यात्म का मार्ग पाना भी संभव नहीं है।' संत यशोधर्म की इस बात से शिष्य की आंखें खुल गईं और वह समझ गया कि अध्यात्म के मार्ग के लिए संकल्प एवं समर्पण दोनों ही अनिवार्य हैं।
एक राजा था। उसके मंत्री के दो पुत्र थे। बड़ा वाला अल्पबुद्धि का था जबकि छोटा तीव्र बुद्धि का। राजा ने छोटे को अपना दीवान नियुक्त कर दिया, जबकि बड़े को रसोई की जिम्मेवारी दे दी। मगर वह रसोई की व्यवस्था भी ढंग से न संभाल सका। कभी खाने में देर हो जाती तो कभी भोजन बेस्वाद बनता। छोटा भाई खाने को लेकर शिकायत करता तो बड़ा भाई कहता, 'खाना बनाना कलम चलाने जैसा आसान काम नहीं है।' एक दिन छोटे भाई ने पूछा, 'तो क्या आप मेरा काम कर लेंगे?' बड़े भाई ने सरलता से कहा, 'क्यों नहीं। जरूर करूंगा।' इस तरह दोनों ने काम की अदला-बदली कर ली। अब बड़ा भाई दरबार जाने लगा।
एक दिन राजा ने उसे सोने की एक डिबिया देकर कहा, 'तुम इसे मेरे मित्र राजा को देकर आना और उसका समाचार भी लेते आना।' बड़ा भाई पड़ोसी राज्य में गया और मित्र राजा को वह डिबिया दे दी। राजा ने डिबिया खोली तो उसमें मखमल में राख पड़ी थी। इस पर वह चौंका। उसने पूछा, 'दीवान जी, यह राख कैसी है?' बड़ा भाई मूर्ख और घमंडी तो था ही उसने झट से कहा, 'अगर आपने हमारे महाराज की अधीनता स्वीकार नहीं की तो आपका राज उसी तरह उड़ा दिया जाएगा जिस तरह फूंक मारने से राख उड़ जाती है।' यह सुनकर राजा आगबबूला हो गया।
उसने बड़े भाई को कैद कर लिया। जब छोटे भाई को इसका पता चला तो वह दौड़ता हुआ वहां पहुंचा। उसने राजा से कहा, 'आपको मेरे महाराज ने एक अनमोल उपहार भेजा था पर आपने उसकी कद नहीं की।' राजा ने कहा, 'उसमें तो राख है।' इस पर छोटे भाई ने कहा, 'हमारे महाराज ने एक यज्ञ कराया था। उसकी पूर्णाहुति पर उसकी राख को घनिष्ठ मित्र होने के कारण आपको भेजा था। इससे राज्य में शांति और समृद्धि आएगी।' यह सुनते ही राजा ने छोटे भाई से क्षमा मांगी और बड़े भाई को मुक्त कर दिया।
स्वर्ग का रास्ता:
किसी शहर में धार्मिक प्रवृत्ति का एक व्यक्ति रहता था। उसकी इच्छा थी कि इस जन्म में चाहे जो करना पड़े, लेकिन मरने के बाद उसे स्वर्ग अवश्य मिले, इसलिए वह गरीबों की सेवा करता, दान-दक्षिणा देता, कमाई का अधिकांश भाग परोपकार में ही लगा देता। लेकिन जैसे-जैसे उसकी परोपकार की भावना का विकास हो रहा था वैसे ही उसमें अहंकार भी बढ़ रहा था। कोई उसकी दानशीलता पर टीका-टिप्पणी कर देता तो उसके क्रोध की सीमा न रहती। एक बार एक प्रसिद्ध संत उसके घर के पास आकर रुके तो वह फौरन उनकी सेवा में उपस्थित हो गया और उनसे भी स्वर्ग जाने का उपाय पूछने लगा।
संत ने उस व्यक्ति को ध्यानपूर्वक ऊपर से नीचे तक देखा और उपेक्षा से कहा, 'तुम स्वर्ग जाओगे? तुम तो देखकर ही लंपट मालूम पड़ रहे हो। तुम परोपकारी या दानी व्यक्ति नहीं धर्म के ठेकेदार ज्यादा लग रहे हो।' इतना सुनते ही वह व्यक्ति क्रोध से भर उठा और उसने संत को मारने के लिए डंडा उठा लिया। संत ने मुस्कराते हुए कहा,' तुम में तो तनिक भी धैर्य नहीं। इतनी अधीरता और अहंकार के होते हुए तुम स्वर्ग कैसे जा पाओगे?' व्यक्ति को संत की कही हुई बातों का मर्म समझ में आ गया तो वह संत के चरणों में गिर पड़ा और अपनी गलती के लिए क्षमा मांगने लगा। उसने आगे से कभी क्रोध न करने तथा अहंकार वृत्ति के त्याग का भी प्रण किया। संत ने कहा, 'जिस दिन तुम सब अवगुणों से मुक्त हो जाओगे उस दिन स्वर्ग की सृष्टि यहीं पर हो जाएगी।'
इंसानियत की मिसाल:
बहुत दिनों से पड़ोस के एक बादशाह से हजरत उमर की लड़ाई चल रही थी। संधि करने का प्रस्ताव आया तो हजरत उमर एक ऊंट पर चढ़कर रवाना हो गए। ऊंट की नकेल पकड़ने वाला एक गुलाम भी उनके साथ था। चार कोस चलने के बाद हजरत उमर ऊंट से नीचे उतरे और गुलाम के हाथ से नकेल लेकर बोले, 'चलो, अब तुम ऊंट पर बैठ जाओ। नकेल पकड़ कर मैं चलूंगा।'
गुलाम की समझ में कुछ न आया। उसने कहा, 'मालिक, यह कैसे हो सकता है?' हजरत उमर ने कहा, 'क्यों नहीं हो सकता? चलने से तो सभी थकते हैं। तुम थक जाओ तो ऊंट पर बैठ जाओ। जब मैं थक जाऊंगा तो मैं ऊंट पर बैठ जाऊंगा। यहां भेदभाव का सवाल ही कहां है? आखिर हम दोनों इंसान हैं और दोनों की तकलीफें एक हैं।' लाख इनकार करने पर भी गुलाम को ऊंट पर बैठना ही पड़ा। इस तरह चार-चार कोस पर दोनों अपनी स्थिति बदलते रहे।
चढ़ते-उतरते हजरत उमर उस बादशाह की राजधानी में जा पहुंचे। संयोग ही था कि जब वे लोग शहर में दाखिल हुए, तब गुलाम ऊंट की पीठ पर था और हजरत उमर ऊंट की नकेल पकड़े हुए थे। वहां के वजीर ने आकर गुलाम को सलाम किया तो गुलाम ने परेशान होकर कहा, 'जी, मैं तो गुलाम हूं। बादशाह हजरत तो वह हैं, जो ऊंट की नकेल पकड़े खड़े हैं।' यह सुनकर सब हैरान रह गए। चारों तरफ यह बात फैल गई। लोग समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर यह माजरा क्या है? जब यह किस्सा वहां के बादशाह तक पहुंचा तो वह भी हैरत में पड़ गया। वह दौड़कर हजरत उमर के पास पहुंचा। उसने उमर का सम्मानपूर्वक स्वागत किया और कहा, 'जो बादशाह अपने गुलाम के साथ ऐसा व्यवहार करता है, उससे कैसी लड़ाई और कैसी संधि? आज से हजरत उमर मेरे उस्ताद हैं, और मैं उनका शागिर्द।'
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